पटना (ब्यूरो कार्यालय)/-श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के सभी सदस्यों के तरफ से आपको बिहार विधानसभा अध्यक्ष बनने पर हार्दिक बधाई दिया जाता है। आपके बिहार विधानसभा अध्यक्ष बनने से बिहार के पत्रकारों को एक नई उम्मीद जगी है जिसमें सत्र के दौरान न्यूज़ कवरेज करने वाले पत्रकारों की समस्याओं का खास ध्यान रखा जाएगा। साथ ही साथ बिहार सरकार के द्वारा पत्रकारों को लेकर जो पेंशन योजना बनाई गई है उसके कानून में सशोधन की आवश्यकता है ताकि अत्यधिक पत्रकार इससे लाभान्वित हो सके।
महाशय आपको बताते चलें कि , राज्य सरकार के द्वारा पत्रकार पेंशन योजना लागू कर पत्रकारों का एक तरफ जहां मनोबल बढ़ाया गया तो दूसरी तरफ इस योजना को नियम कानून में इतना मजबूत कर दिया गया कि बिहार के 95% पत्रकार अपात्र हो गए जिन्हें पेंशन योजना का लाभ नहीं मिल रहा है जिसमें संशोधन की आवश्यकता है।
राज्य सरकार ने पत्रकारों की मासिक पेंशन राशि प्रतिमाह छह हजार रुपये से बढ़ाकर 15 हजार रुपये किया है, इसके लिए हम माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी एवं आपको हृदय की गहराइयों से धन्यवाद देते हैं। वास्तव में राज्य सरकार ने पेंशन की राशि बढ़ाकर पत्रकारों को जो सम्मान दिया है, वह अविस्मरणीय है। हम इसके लिए आपके आभारी हैं।
श्रीमान इस पत्र के माध्यम से हम आपके संज्ञान कुछ बातें रखना चाहते हैं। वह यह कि पत्रकार पेंशन नियमावली -2019 में हालांकि कहीं भी इसका उल्लेख नहीं किया गया है कि पेंशन का लाभ उन्हीं पत्रकारों को मिलेगा, जिनके वेतनमान, मानदेय अथवा पारिश्रमिक का एक अंश प्रतिमाह ईपीएफ में जमा होता है। फिर भी पेंशन के लिए ईपीएफ को अनिवार्य शर्त के रूप में बताया जा रहा है। इससे कतिपय पत्रकार जिनके मानदेय का एक अंश ईपीएफ में जमा नहीं होता है, उनके आवेदन को अनुशंसित नहीं किया गया है।
श्रीमान, यह सार्वजनिन सच है कि डिजिटाइजेशन के इस युग में छोटा-बड़ा हर लेन-देन ऑनलाइन होता है, इससे व्यवसाय या फिर दैनंदिन लेन-देन के लिए कहीं नकद राशि ले जाने को जरूरत नहीं रहती। इससे न सिर्फ लूटपाट का जोखिम कम हुआ है, अपितु आमलोगों का जीवन भी सरल और सहज हुआ है। निश्चित तौर पर हर व्यक्ति को लेन-देन के लिए डिजिटल माध्यम को ही अपनाना चाहिए। लेकिन, यह दुखद सच है श्रीमान कि आज भी अनेक मीडिया हाउस द्वारा अपने कर्मियों के मानदेय का भुगतान नकद किया जाता है और साथ में साक्ष्य के लिए भुगतान की पर्ची दे दी जाती है। कतिपय बड़े मीडिया हाउस में ही कर्मियों के लिए ईपीएफ की व्यवस्था है और सैलरी स्लिप प्रदान किया जाता है। ऐसे में छोटे मीडिया हाउस में काम करनेवाले पत्रकारों को न तो ईपीएफ की सुविधा मिल पाती है और न ही उन्हें सैलरी स्लिप दिया जाता है। ऐसे में यदि पत्रकार पेंशन योजना का लाभ पाने के लिए ईपीएफ और सैलरी स्लिप को अनिवार्य बना दिये जाने से छोटे मीडिया हाउस में काम करनेवाले पत्रकारों का एक बड़ा समूह पेंशन का लाभ पाने से वंचित हो जाएगा। जबकि, सच यह है कि पेंशन की सबसे अधिक जरूरत छोटे मीडिया हाउस में काम करनेवाले पत्रकारों की है, क्योंकि एक तो वे बहुत कम मानदेय पर काम करते हैं, दूसरा उन्हें ईपीएफ जैसी सुविधाएं भी नहीं मिल पाती। श्रीमान, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सही मायने में आज पत्रकारिता धर्म का पालन छोटे हाउस के पत्रकार ही कर रहे हैं। वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित होने के बावजूद और कम संसाधन में भी जीवट और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ पत्रकारिता धर्म का निर्वहन कर रहे हैं। अतः श्रीमान् से विनम्र निवेदन है कि उपरोक्त तथ्यों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करते हुए पत्रकार पेंशन योजना-2019 में ईपीएफ की अनिवार्यता (यदि नियमावली में हो तो) में शिथिलता प्रदान कर सेवा अवधि के साक्ष्य के रूप में विकल्प के तौर पर मानदेय की भुगतान पर्ची, एक्रिडेशन कार्ड अथवा बिहार डायरी में अंकित नाम को मान्यता देने का निर्देश दें। इसके लिए हम आपका सदैव आभारी रहेंगे।
रिपोर्ट:- प्रवीण ओझा







