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भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा ने विष्णु पद कॉरिडोर निर्माण योजना पर पुनर्विचार की मांग

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तीर्थ नगरी गया जी में सरकार द्वारा प्रस्तावित विष्णुपद कॉरिडोर निर्माण योजना के दूरगामी परिणामों पर गहन विचार-विमर्श करने हेतु भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा तथा कौटिल्य मंच के तत्वावधान में स्थानीय डॉ. विवेकानंद पथ पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया। विभिन्न सामाजिक संगठनों के मार्गदर्शक तथा इन दोनों संस्थाओं के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र ने इस गरिमामयी सभा की अध्यक्षता की। इस बैठक में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र एवं राज्य सरकार से यह विनम्र किन्तु दृढ़ आग्रह किया गया कि इस महात्वाकांक्षी कॉरिडोर निर्माण से उत्पन्न होने वाले व्यापक परिवर्तनों पर गहन पुनर्विचार करने के पश्चात ही किसी प्रकार की अग्रिम कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।
सभा में उपस्थित सभी प्रबुद्धजनों ने इस तथ्य पर गहरी चिंता व्यक्त की कि प्रस्तावित कॉरिडोर के निर्माण की चपेट में अनेक अति प्राचीन मठ और मंदिर आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त मोक्षदायिनी फल्गू नदी के पावन तट और मुख्य मंदिर के समीप स्थित उन पवित्र वेदियों के अस्तित्व पर भी गहरा संकट मंडरा रहा है, जो मानव निर्मित नहीं हैं, बल्कि शास्त्रों के अनुसार जिनकी स्थापना स्वयं सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने की थी। यह संपूर्ण क्षेत्र विश्व के करोड़ों सनातनी धर्मावलंबियों की अगाध आस्था एवं अटल विश्वास का सर्वोच्च केंद्र है, जिसके मूल स्वरूप में किसी भी प्रकार का परिवर्तन सनातन जनमानस को आहत कर सकता है। कॉरिडोर के वर्तमान मानचित्र को लेकर यह चिंता भी जताई गई कि इसमें पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व रखने वाले तीर्थ पुरोहितों के अति प्राचीन भवनों के साथ-साथ बड़ी संख्या में बसे स्थानीय निवासियों को वहां से विस्थापित करने की योजना है। सदियों से स्थापित और धर्म-कर्म में रचे-बसे जनजीवन के अस्त-व्यस्त होने की इस आशंका ने स्थानीय लोगों के हृदय में घोर चिंता और भय का वातावरण उत्पन्न कर दिया है।
इस ज्वलंत विषय पर महासभा और मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र ने अपना स्पष्ट मत रखते हुए कहा कि विकास की रूपरेखा हमारी शाश्वत धरोहरों की बलि देकर कभी नहीं खींची जानी चाहिए। उन्होंने शासन से यह पुरजोर मांग रखी कि कॉरिडोर के दो सौ मीटर की परिधि में आने वाले सैकड़ों पुराने ढांचों और आध्यात्मिक केंद्रों को हर हाल में संरक्षित किया जाए। उनका दृढ़ मानना था कि सरकार को विकास और विरासत के मध्य एक ऐसा संतुलित मार्ग खोजना चाहिए जिससे सनातन धर्म की अगाध आस्थाएं सर्वदा अक्षुण्ण बनी रहें और किसी भी तीर्थ पुरोहित को अपनी पैतृक भूमि से विस्थापित न होना पड़े।
इसी वैचारिक क्रम को अत्यंत निरंतरता के साथ आगे बढ़ाते हुए प्रख्यात विद्वान आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने भी अपने सारगर्भित विचार सभा के सम्मुख प्रस्तुत किए। उन्होंने शास्त्र सम्मत प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट किया कि गया तीर्थ की असीम महिमा वहां के प्राचीन तीर्थ पुरोहितों और स्वयंभू वेदियों से ही पूर्णता प्राप्त करती है। उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि यदि इन पौराणिक मान्यताओं वाले पवित्र स्थानों और पीढ़ियों से धर्म ध्वजा फहराने वाले पुरोहितों के आवासों को विस्थापित किया गया, तो गया जी का मूल आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक स्वरूप ही सदैव के लिए खंडित हो जाएगा। अतः धर्म की रक्षा और तीर्थ की गरिमा हेतु इन पावन स्थलों का संरक्षण अत्यंत अनिवार्य है। इन सभी विचारों को समाहित करते हुए अंततः दोनों संस्थाओं ने संयुक्त रूप से शासन-प्रशासन से यह मांग की है कि गया जी की पवित्रता और सनातनियों की भावनाओं को सर्वोपरि रखते हुए इस संपूर्ण योजना की तत्काल समीक्षा की जाए क्योंकि विकास आवश्यक है परंतु वह हमारी आस्थाओं के विनाश की कीमत पर किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
इसके अलावा जिन प्रमुख व्यक्तियों ने अपने विचार रखें उनमें डॉक्टर ज्ञानेश भारद्वाज डॉ रविंद्र कुमार डॉक्टर दिनेश कुमार सिंह प्रोफेसर अशोक स्वामी सुमन गिरी अजय मिश्रा आचार्य सुनील पाठक अमरनाथ कुमार मनीष कुमार डिंपल किरण पाठक हरि नारायण त्रिपाठी सत्येंद्र दुबे अरुण ओझा रंजन पांडे रंजू देवी विश्वजीत चक्रवर्ती मांडवी गुर्दा शारदा साहिबा शंभू गिरी दिलीप कुमार नीरज वर्मा कुंदन मिश्रा रूबी कुमारी अच्युत प्रेरणा मराठे रंजीत पाठक पवन मिश्र डॉक्टर प्रियांशु मिश्रा फूल कुमारी नीलम कुमारी सोनी मिश्रा यादि उल्लेखनीय थे।

रिपोर्ट:-प्रियाशु मिश्रा

V9 News
Author: V9 News

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