गया जी के स्थानीय डॉ० विवेकानंद पथ पर भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के तत्वावधान में महर्षि परशुराम की जयंती अत्यंत गरिमामयी ढंग से संपन्न हुई। इस पावन अवसर पर भगवान विष्णु के छठे अवतार महर्षि परशुराम के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं को उजागर किया गया। समारोह का भव्य शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण की ध्वनियों के बीच डॉ० विवेकानंद मिश्र एवं आचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने समाज में व्याप्त उन भ्रांतियों का पुरजोर खंडन किया जिनमें महर्षि को केवल क्रोधी या संहारक के रूप में चित्रित किया जाता है।
समारोह को संबोधित करते हुए डॉ० विवेकानंद मिश्र ने अपने विचारों में कहा कि महर्षि परशुराम शास्त्र और शस्त्र के परम ज्ञाता थे। उनका भीषण प्रतिज्ञा, उनका क्रोध किसी जाति विशेष के विरूद्ध नहीं व्यक्तिगत अहंकार की उपज नहीं, बल्कि अधर्म और सत्ता के अहंकार के विरुद्ध एक सात्विक विद्रोह था। क्योंकि महर्षि ने केवल उन्हीं क्रूर अत्याचारियों का दमन किया जिन्होंने
मानव सहित निरीह प्राणियों को दौड़ा-दौड़ा कर आखेट करना, गौशालाओं तथा वैदिक पाठशालाओं को उजाड़ना अपना पेसा बना दिया था। डॉक्टर मिश्र के अनुसार महर्षि ने शस्त्र केवल इसलिए उठाए ताकि धर्म धरती और प्राणियों की की रक्षा कर सकें।
वहींआचार्य सच्चिदानंद मिश्र ने महर्षि के आध्यात्मिक और दार्शनिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए कहा कि परशुराम जी राष्ट्रनीति के प्रथम ऐसे प्रयोगधर्मी थे जिन्होंने समाज में वर्ग-भेद से ऊपर उठकर केवल न्याय को प्राथमिकता दी। आचार्य जी ने स्पष्ट किया कि महर्षि का जीवन कोमलता और कठोरता का अद्भुत समन्वय था, वे ऋषियों के लिए अत्यंत दयालु और ज्ञानियों के लिए प्रेरणास्रोत थे, जबकि केवल उन्हीं आततायियों के लिए काल थे जो धर्म और धरती के लिए विध्वंसक बन चुके थे।

भारतीय जन क्रांति दल के संस्थापक अध्यक्ष आरडी मिश्र ने कहा कि परंपरागत रूप से समाज में यह प्रचारित किया जाता रहा है कि महर्षि परशुराम क्षत्रियों के विनाशक थे, किंतु यह व्याख्या सनातन संस्कृति को नीचा दिखाने के उद्देश्य से की गई एक ऐतिहासिक भूल है। सच्चाई यह है कि जब सत्ता मद में अंधी होकर, निर्दोष को रक्त बहाने लगे, तब उसे सत्ता को उखाड फेंकना सबसे बड़ा ब्राह्मणों का मानवीय धर्म है।
प्रसिद्ध समाजसेवी, भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा के संरक्षक पूर्व पुलिस महानिदेशक सुरेश भारद्वाज जी ने अभासीय कहा की जब धरती पर मानवीय समाज क्रूर हिंसक क्षत्रिय शासकों से त्राहिमाम कर रहा था, यज्ञों में विघ्न डालना और वैदिक विद्यापीठ को बंद करना, ऋषियों को प्रताड़ित करना चरम पर था, तब महर्षि ने प्राणियों की रक्षा हेतु शस्त्र उठाकर समाज को भयमुक्त किया। उनके व्यक्तित्व में समाहित तेज यह संदेश देता है कि एक ब्राह्मण का कर्तव्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि राष्ट्र और समाज की सुरक्षा के लिए पराक्रम दिखाना भी उसकी जिम्मेदारी है।
अंत में धन्यवाद ज्ञापित करते हुऎ भाजपा के वरिष्ठ नेता हरि नारायण त्रिपाठी ने कहा कि
महर्षि परशुराम का प्राकट्य उत्सव हमें इस शाश्वत सत्य की याद दिलाता है कि जब-जब समाज में दुराचारी अपनी सीमाओं को पार करते हैं, तब-तब किसी न किसी रूप में ईश्वरीय शक्ति को दंडनायक बनकर अवतरित होना पड़ता है।
डॉ ज्ञानेश भारद्वाज के अलावे प्राय: सभी लोगों कहना था कि उनका फरसा मात्र एक शस्त्र नहीं, बल्कि न्याय का प्रतीक है जो आज भी हमें अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस प्रदान करता है। गया जी में आयोजित इस समारोह ने यह सिद्ध कर दिया कि महर्षि परशुराम के आदर्श आज के समय में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने त्रेता युग में थे, और समाज को उनके त्याग, ज्ञान और शौर्य से निरंतर प्रेरणा लेते रहना चाहिए ताकि एक न्यायप्रिय राष्ट्र का निर्माण हो सके।
इस अवसर पर कुछ प्रमुख लोगों में डॉक्टर दिनेश कुमार सिंह, डॉक्टर रविंद्र कुमार, मो. उमैर, गुड्डू बाबू, सुबी, मोहम्मद याहिया, जगन गिरी, देवनंदन प्रसाद यादव, राजेश त्रिपाठी, सत्येंद्र दुबे, मृदुला मिश्रा, शारदा साहिबा, अरुण ओझा, गणेश मिश्रा, रमाशंकर मिश्रा, सोनी कुमारी, अमरनाथ मिश्र, सुषमा कुमारी, किरण पाठक, रूबी कुमारी, राम नरेश पाठक, मनीष कुमार,प्रोफेसर अशोक कुमार, शंभू मिश्रा, दीपक पाठक, आनंद कुमार, उत्तम पाठक, शंभू गिरी, नीरज वर्मा, रंजना पांडेय, आचार्य सुनील पाठक, अमरनाथ पांडेय, रंजीत पाठक, प्रेमनाथ टईया, पवन मिश्रा, नीलम कुमारी, फूल कुमारी, कविता राऊत, दिलीप कुमार, शिवजी सिंह, पियूषा कुमारी, नम्रता ओझा, शीतल चौबे,पिंकी कुमारी,कुंदन जी, रवि कुमार दास, सुरेश राम, गौतम कुमार, टिंकू कुमार, बबलू गोस्वामी, सोना देवी, अजय मिश्रा, सुनील कुमार, यादि उल्लेखनीय थे।
रिपोर्ट:-प्रियाशु मिश्रा







