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वृंदायन

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वृषभानु सुता बृज दुलारी

है कृष्ण हृदय में वास किये।

मन अनुरंजित करने वाली

जन-जन के हित अनुराग लिये।

जन का कल्याण सदा करती

तुम कृष्ण हृदय का प्रेरक हो।

तुम मंगल की मूरत माते

तुम विश्व विधान नियामक हो।

तुम कृष्ण हृदय में प्रेरक बन

जग का कल्याण सदा करती।

दुर्दिन में तुम ही तो माते

जन-जन का पीड़ हरण करती।

आदि अंत हो मध्य तुम्हीं

जन कल्याण का आश लिये।

तुम जग के मानस पट पर माँ

हो प्रेम रूप में वास किये।

तेरी सुषमाओं से शोभित

यह विश्व सकल मंगलमय है।

तेरी ममता वो करुणा से-

यह विश्व नियंत्रित उज्ज्वल है।

तुम ललित भाव जन मन भरती

जीवन को आह्लादित करती।

जन-जन पर करुणा बरसा कर

जन-जन की हो पीड़ा है

अदृश्य प्रेम का रूप लिये

तुम हृदय-हृदय में वास किये।

समता का भाव जगाती तुम-

हो निश्छल मन अनुराग लिये।

तुम कृष्ण हृदय में वास किये,

बन गयी कृष्ण की आत्मा।

तेरे कारण ही मुरारी बन गये परमात्मा।

कल्याणकारी विश्व का तुम उन्मुखी सा भाल है।

सरजना का गीत गाते विश्व भी उदीमान है।

भव तरनि तू ही हो माते, तू ही तो पतवार है।

सिंधु में तू ही हो माते, तू ही तारणहार है।

कृष्ण रूप में वृंदा है, वृंदा रूप में कृष्ण।

दोनों की है एक आत्मा कोई नहीं है भिन्न!

सदा आराधिका रही कृष्ण की कहलाती है राधा।

इसके अर्चन वंदन से रहे न कोई बाधा।

कवि – गजेन्द्र लाल अधीर, गया

V9 News
Author: V9 News

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