गया (ब्यूरो कार्यलय)/-राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर जब हम विज्ञान की उपलब्धियों का स्मरण करते हैं, तब यह प्रश्न भी स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या विज्ञान वास्तव में मानवता के लिए वरदान है, या धीरे-धीरे अभिशाप का रूप धारण करता जा रहा है। इस संदर्भ में छात्र नेत्री कुमारी पियूषी का चिंतन हमें गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करता है।
विज्ञान ने निस्संदेह मानव जीवन को अभूतपूर्व ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों से लेकर समुद्र की अथाह गहराई तक, सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के रहस्यों को उजागर करने में विज्ञान ने अद्वितीय सफलता प्राप्त की है। आधुनिक तकनीकों और नवाचारों ने राष्ट्र को गौरवान्वित किया है और विश्व को चमत्कृत किया है। आज हम जिस सुविधा, संचार और चिकित्सा के युग में जी रहे हैं, वह विज्ञान की ही देन है।किन्तु इस उज्ज्वल पक्ष के साथ एक चिंताजनक सत्य भी जुड़ा हुआ है। विज्ञान के अंधाधुंध और अविवेकपूर्ण उपयोग ने मानव मूल्यों और प्रकृति के संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। प्रकृति की मर्यादाओं को लांघने की प्रवृत्ति ने हमें ऐसे दुष्परिणामों के सामने खड़ा कर दिया है, जिनसे पूरा मानव समाज जूझ रहा है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और नैतिक मूल्यों का ह्रास—ये सभी संकेत हैं कि विज्ञान का उपयोग सही दिशा में नहीं हो रहा है।आज विज्ञान, जो कभी जीवन को सरल और सुखद बनाने का साधन था, कई बार संपूर्ण प्राणि-जगत के लिए संकट का कारण बनता दिख रहा है। यह स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब विज्ञान का उपयोग विनाशकारी उद्देश्यों के लिए किया जाता है, जिससे शांति और संतुलन खतरे में पड़ जाते हैं।
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस हमें केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह आत्ममंथन का भी समय है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि विज्ञान का वास्तविक उद्देश्य मानव जीवन को बेहतर बनाना, प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करना और समस्त जीव-जगत के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है।
संवाददाता:- प्रियांशु मिश्रा







